ये शेहर

| October 18th, 2008
Attempt at hindi poetry, please ignore the infinite spelling mistakes!

ये शेहर क्यु इतना खामोश है?
रौन्दा जाता हैं हर रोज़, इन्सानो और मशिनो से,
पर एक आह भी नही निकल्ती.

बस अकेला सा चुप चाप देख्ता रेह्ता है.
हर वह चीख, हर कोहराम,
इसकी खमोशी का प्रतिबीबं हैं.

लान्खो लोग आते है रोज़,
अप्ने सपनौ का खाली केन्वस लीये.
और इस शेहेर के लहू कि हर बून्द,
किसि का क्रिम्सन सनराइस बन्ती है.

लोगो के जूतो से पेहले तो ज़खम और छाले भी थे बदन पर इस्के.
पर अब सब सुन्न है.
लालच के धुए से लोगो ने कालीन भी पहुत पोती,
हर परिवार ने घोप दिये कुछ पिल्लर इस्के सीने मे.

ये शेहेर क्यु इतना चुप है?
कभि मुझ्से बात नही करता,
कभी पूछता नही है, कैसे हो?
ना कभी मेरे सवालो का जवाब देता है.
बस एक ट्क देख्ता रहता है.

ज़रा सडक पर कान लगा कर सुनो तो कोइ,
क्या ज़िन्दा भी है ये?
या एक कफ़न उडा कर इसे,
कही और बस जाये हम!

2 Responses to “ये शेहर”

  1. Anonymous Says:

    nice attempt

  2. mgeoffrey Says:

    good blog, come on.

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